भारत देश की ये विडंबना ही रही है यहाँ राजनीती लाभनीति में तब्दील होती जा रही है अपने लाभ के लिए राजनेता अक्सर विवादित बयानों से सुर्ख़ियो में रहते है लेकिन परिणाम कभी देश को कभी जनता को भुगतना पड़ता है बीते चुनाव में इसकी बानगी जी भर के देखने को मिली खैर वो समय था लोगो के मत को अपनी ओर आकर्षित करने का तो किया गया लेकिन विरोध के लिए विरोध करना कहा तक तर्कसंगत है जैसा की अभी जयललिता ने मोदीजी द्वारा सार्क देशो के राष्ट्रपतियों एवं प्रधानमंत्रियों आमंत्रित करने पर दिया गया बयान की श्रीलंका के राष्ट्रपति को बुलाना तमिलो के स्वाभिमान के खिलाफ है तमिलो का श्रीलंका विरोध राजीव गांधी के ज़माने से ही है जिसको जयललिता और वाइको जैसे नेताओ ने ;तमिल वोट को अपने पक्ष में रखने लिए अक्सर विरोधी मानसिकता वाले बयान जारी करते रहे है इसके पहले सप्रंग 1 और सप्रंग2 की सरकार भी महज वोट बैंक और तमिल नेताओ के ही वजह से श्रीलंका भारत के सम्बन्धो के मामले में ढुलमुल रवैया अपनाती रही है जिसके कारन श्रीलंका का झुकाव भारत की तरफ से धीरे धीरे ख़त्म होता जा रहा था जबकि वैश्विक परिदृश्य लिहाज से पडोसी देशो के साथ मिलकर चलना और उन पर अपना प्रभुत्व बनाये रखना भारत के लिए अत्यंत ही जरूरी है जिसका फायदा अब चीन उठा रहा है वो भी भारत के ढुलमुल विदेशी नीति के वजह से जिसका कारण पूर्ववर्ती सरकार के कमजोर इच्छाशक्ति के साथ साथ भारत के कुछ विशेष वर्ग एवम क्षेत्रीय दलों को नाराज न कर पाना भी एक मजबूत वजह है इसकी बानगी जम्मू कश्मीर और तमिलनाडु सरकार अक्सर दिखाते रहे है तमिलनाडु जयललिता और उनकी पूर्ववर्ती सरकार हमेशा श्रीलंका के मामले में केंद्र सरकार को बैकफुट पर जाने लिए मजबूर करती रही है केंद्र चाहे इसे गठबंधन की मजबूरी कहे या कुछ और लेकिन उनकी कमजोर इच्छाशक्ति और पद लालसा ही एकमात्र वजह रही है जिसको भारत के बाहर प्रतिद्वंदी देशो और पडोसी मुल्को ने भापा और अपना एजेंडा तैयार किया अब चूँकि भारत में एक नई चुनी हुई सरकार जो की गठबंधन की मजबूरी से भी बाहर है साथ ही साथ नरेंद्र मोदी जिनके बारे में मिडिया द्वारा भी सुना जाता है की ये एक कुशल प्रशाषक और मजबूत इच्छाशक्ति के धनी व्यक्ति है अब देखना है की मोदी सरकार विदेश नीति के मामले में क्या अपने पूर्ववर्ती सरकारों की तरह ही ढुलमुल रवैया जारी रखेंगे इस लालसा में की अगले चुनाव में उनकी पार्टी को दक्षिणी दुर्ग भेदने का मौका मिल जाये या अपने दृण इच्छाशक्ति के तहत भारत का सम्मान विदेशियो एवं पडोसी देशो में मजबूत करे ताकि गुटनिरपेक्ष देश बार फिर भारत के पाले में आने को तैयार हो जाये (जैसा की गुटनिरपेक्ष देश अब भी भारत को एक अच्छा मित्र और लीडर समझते है )और वो तभी भारत के साथ खुलकर खड़े हो सकते है जब तक की भारत स्वयं अपनी स्थिति मजबूत करके एक नज़ीर पेश करेगा जब पडोसी मुल्को एवं गुटनिरपेक्ष देशो को लगने लगेगा की भारत उनके हितो की रक्षा एवं उनकी सुरक्षा कर सकने में सक्षम है उसी दिन ये देश भारत की तरफ आ जायेंगे और विश्व में भारत की स्थिति नाटो ग्रुप ,वारसा पैक्ट के मुखिया अमेरिका और रसिया की तरह होगा इसलिए अब इसकी जिम्मेदारी भारत के जनता द्वारा चुनी हुई मोदी सरकार से है अब देखना ये है की मोदी अपने देश को बुलंदियों पर किस तरह पहुंचाते है या वो भी पदलालसा की वजह से मौन धारण करना ज्यादा मुफीद समझेंगे ये तो समय के गर्भ में है। ...................
मंगलवार, 27 मई 2014
बुधवार, 9 मार्च 2011
भूखा अन्नदाता
किसान भारतीय जीवन शैली का एक अभिन्न अंग सबकी भूख मिटने वाला यह किसान आज भी सदियों से भूखे पेट सोने को मजबूर है कहने को तो सामन्तवाद का खात्मा हो गया है और देश में लोकतंत्र का बोलबाला है लेकिन इस लोकतंत्र में भी किसान की हालत आज भी बदतर है भारतीय कृषि आज भी रामभरोसे ही चल रहा है किसानो को खेतो में पानी के लिए आज भी लगान सिनेमा के पत्रों की तरह काले-काले मेघो का इंतजार रहता है बेशक हम बीसवी सदी में आ पहुचे है बेशक अमेरिकी थिंक टैंक का ये कहना की भारत अगली महाशक्ति है लेकिन इसी भारत के गरीब किसानो के लिए सरकार के पास बिजली नहीं है और बिजली ही नहीं कृषि से सम्बन्धित कोई भी कारगर योजना का अभाव दिखता है हाथी के दांत की तरह दिखावे के लिए सहकारी समितिया तो बना दी गयी है लेकिन उनसे मिलाने वाली सुविधाओ के लिए किसानो को सुविधा शुल्क का भी भुगतान करना पड़ जाता है
इतिहास गवाह है जिस किसी भी शासनकाल में खेती के लिए प्रोत्साहन दिया गया उस काल में राज्य अपने स्वर्णकाल में गिने जाते रहे है चाहे वो अकबर का वक्त रहा हो या फिर दक्षिण भारत के प्राचीन विजयनगर राज्य में राजा कृष्ण देव का शासन काल रहा हो जबकि हमारे निति नियंताओ ने तो इतिहास से सबक लेना ही बंद कर दिया है
बुंदेलखंड की बदहाली को सरकार भले ही भुला दे लेकिन जिसके बच्चे भूख से दम तोड़ दिए हो उनका घाव अभी तक भरा नहीं है 99 .8 %किसानो को 2009 में खरीफ की फसल पर नुकसान सहना पड़ा इनमे से 74 %किसानो को 50 से १००%तक का नुकसान उठाना पड़ा जबकि ३३%लोगो को कोई सहायता नहीं मिली एक समय था जब महोबा का पान इरान तक जाता था और आज महोबा में ही बाहर से पान मंगाया जाता है बुज़ुर्ग समाजसेवी वासुदेव चौरसिया का कहना है की यहाँ पिछले 6 वर्ष में पान की खेती 500 से घटाकर १०० एकड़ से भी कम रह गयी है जहा पहले 5000 परिवार इस पर निर्भर थे वही आज 50 की संख्या में सिमट चुके हैकभी चंदेलो के शौर्य ,छत्रसाल की वीरता और झासी की रानी के लिए मशहूर रहा बुंदेलखंड आज बर्बाद किसानी और सूखे के लिए मशहूर हो चला है सूखे की गंभीरता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है की एक सर्वेक्षण के अनुसार बुंदेलखंड में अधिकतर किसान दो हज़ार दस में अपनी खरीफ की फसल का लागत भी नहीं निकल पाए
दो हज़ार आठ में आई वाटर एड इण्डिया की एक रिपोर्ट के अनुसार यूपी सरकार बुंदेलखंड में लोगो को पिने के लिए पानी मुहैया करने और मिटटी के संरक्षण के लिए 2002 से 2007 तक के बीच 292 .50 करोड़ रुपये खर्च किये जबकि ठीक इसी अवधि में पिने के पानी का संकट भी बढ़ा है पानी न होने की वजह से पलायन करने का सिलसिला तेजी से बढ़ रहा है महोबा स्थित एक एन जी ओ "कृति शोध संस्थान"की एक टीम ने जब फरवरी दो हज़ार दस में जिले के आठ गावो का दौरा किया तो पाया की यहाँ के कुल 1668 परिवारों में से 1222 परिवार पलायन कर चुके है प्रकिती की मार और सरकारों की बेरूखी ने यहाँ किसानो को पलायनवादी बनाने पर मजबूर कर दिया है वे तभी अपने गाव लौटते है जब किसी की शादी हो या फिर बारिश की उम्मीद
भारत में अकेले इस प्रदेश की हालत को गौर करने के बाद पता चलता है की हमारा विकास दर कितनी तेजी से आगे जा रही जसा की सरकार का कहना है की हमने मंदी में भी बेहतर जी डी पी की दर बरक़रार रखी है लेकिन मूक सवाल यह है की क्या सच में भारत उदय हो रहा है? फ़िलहाल हम तो इसी गफलत में जी रहे है
मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011
आधुनिक रियासत के नए दीवान
मुंशी प्रेमचंद की लिखित एक कहानी पढ़ी थी "रियासत का दीवान" जिसमे सतिया राज्य के राजा के यहाँ अँगरेज़ शासन का प्रतिनिधि का आगमन तय होता है तो राजा अपने दीवान को आदेश देता है की सारे नगर को सुन्दरता से सजा दिया जाय ताकि साहब को सब कुछ अच्छा लगे और यहाँ की व्यवस्था का गुडगान करते हुए वे अलविदा ले |
कुछ इस तरह का प्रयोजन आज भी इस स्वतंत्र भारत में दिख रहा है जब भी कोई शीर्ष मंत्री या राजनेता किसी शहर या गाँव के दौरे पर आते है तो वहा"कार्य प्रगति पर है" का बोर्ड टंग जाता है जो सड़क महीनो में भी पूरी होती नहीं दिखाती वो रातोरात बना दी जाती है ताकि साहब को सब कुछ अच्छा लगे पिछली बार पूर्वांचल विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में नज़ारा काफी नजदीक से देखने को मिला था जब राज्यपाल महोदय का आगमन होना था रात दिन एक करके सड़क का निर्माण करा दिया गया और राज्यपाल के लौटने के बाद से ही उनमे दरारे आनी शुरू हो गयी यही सिलसिला आज फिर देखने को मिल रहा है मुख्यमंत्री के आगामी दौरे को लेकर बनारस में काफी भागमभाग मची हुई है रोड दुरुस्त किये जा रहे है डीवाईडरो को फिर से रंग रोगन करके उन्हें चमकाया जा रहा है ताकि मैडम की नज़र उन गंदगियो पर न पड़े जिनसे आम लोग गुजरते है सवाल यह है की क्या ये सत्तानशी लोग या बड़े अतिथिगड़ ये सब नहीं जानते और जानते है तो क्यों मौनव्रत धारण किये हुए है कहने को तो भारत को आज़ाद हुए साठ साल से ज्यादा बीत चुके है लेकिन कमोबेश स्थितिया बद से बदतर होती चली जा रही है तब से आज में फर्क बस इतना ही है की आज हम १५ अगस्त २६ जनवरी को बड़ी शान से मानते है तब नहीं नही कर पाते थे क्योकि तब हम गुलाम थे और ये खास दिन आम दिनों की तरह ही बीत जाती थी पहले आम जन अंग्रेजो की गुलामी करते थे और आज अपने ही देश के लोगो की| पुलिस की लाल पगड़ी का खौफ तब भी था और आज भी आम लोगो में बरक़रार है ये बात और है की पगड़ी का रंग बदल गया है लेकिन स्वभाव वही है तब पुलिस अंग्रेजो के हाथ की कठपुतली थी जिसका इस्तेमाल वे आमलोगों पर अपना शिकंजा कसने के लिये करते थे और आज सत्ता में बैठे नेताओ के हाथ में जिसका वे मनचाहा इस्तेमाल किया करते है
रही मासूम राजा का लिखा गीत याद आता है
मुंह की बाट सुने हर कोय,दिल के दर्द न जाने कौन
आवाजों के बाजारों में ख़ामोशी पहचाने कौन
सवाल बड़ा है आखिर कब तक हम गुलाम बने रहेगे ?कोई तो जवाब दो
कुछ इस तरह का प्रयोजन आज भी इस स्वतंत्र भारत में दिख रहा है जब भी कोई शीर्ष मंत्री या राजनेता किसी शहर या गाँव के दौरे पर आते है तो वहा"कार्य प्रगति पर है" का बोर्ड टंग जाता है जो सड़क महीनो में भी पूरी होती नहीं दिखाती वो रातोरात बना दी जाती है ताकि साहब को सब कुछ अच्छा लगे पिछली बार पूर्वांचल विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में नज़ारा काफी नजदीक से देखने को मिला था जब राज्यपाल महोदय का आगमन होना था रात दिन एक करके सड़क का निर्माण करा दिया गया और राज्यपाल के लौटने के बाद से ही उनमे दरारे आनी शुरू हो गयी यही सिलसिला आज फिर देखने को मिल रहा है मुख्यमंत्री के आगामी दौरे को लेकर बनारस में काफी भागमभाग मची हुई है रोड दुरुस्त किये जा रहे है डीवाईडरो को फिर से रंग रोगन करके उन्हें चमकाया जा रहा है ताकि मैडम की नज़र उन गंदगियो पर न पड़े जिनसे आम लोग गुजरते है सवाल यह है की क्या ये सत्तानशी लोग या बड़े अतिथिगड़ ये सब नहीं जानते और जानते है तो क्यों मौनव्रत धारण किये हुए है कहने को तो भारत को आज़ाद हुए साठ साल से ज्यादा बीत चुके है लेकिन कमोबेश स्थितिया बद से बदतर होती चली जा रही है तब से आज में फर्क बस इतना ही है की आज हम १५ अगस्त २६ जनवरी को बड़ी शान से मानते है तब नहीं नही कर पाते थे क्योकि तब हम गुलाम थे और ये खास दिन आम दिनों की तरह ही बीत जाती थी पहले आम जन अंग्रेजो की गुलामी करते थे और आज अपने ही देश के लोगो की| पुलिस की लाल पगड़ी का खौफ तब भी था और आज भी आम लोगो में बरक़रार है ये बात और है की पगड़ी का रंग बदल गया है लेकिन स्वभाव वही है तब पुलिस अंग्रेजो के हाथ की कठपुतली थी जिसका इस्तेमाल वे आमलोगों पर अपना शिकंजा कसने के लिये करते थे और आज सत्ता में बैठे नेताओ के हाथ में जिसका वे मनचाहा इस्तेमाल किया करते है
रही मासूम राजा का लिखा गीत याद आता है
मुंह की बाट सुने हर कोय,दिल के दर्द न जाने कौन
आवाजों के बाजारों में ख़ामोशी पहचाने कौन
सवाल बड़ा है आखिर कब तक हम गुलाम बने रहेगे ?कोई तो जवाब दो
शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011
बेदम सिस्टम बेख़ौफ़ नेता
तिब्बतियों को शरणार्थी मानते हुए जहा भारत सरकार धर्मगुरू दलाई लामा को विशेष अतिथि का दर्जा देता है वही करमापा समेत सभी तिब्बतियों को शरणार्थी का दर्जा हासिल है जबकि तिब्बतियों के निर्वाचित सरकार को भारत सरकार मान्यता नहीं देती खास बात यह है की भारतीय जनमानस सहित भारत सरकार भी इन शर्णार्थियो को आदर भाव से देखती है जिसकी वजह से इनके ऊपर आयकर अधिकारियो या ख़ुफ़िया विभाग की नज़र टेढ़ी नहीं होती फलस्वरूप हिमांचल जैसे सीमांत राज्यों में करमापा के मठ से बरामद हुई दौलत की घटना से आम जन भौचक्का दिखाई देने लगा जबकि एक ओर करमापा और उनके अनुयायी इस धन को दान में प्राप्त हुआ धन मान रहे है वही सरकारी एजेंसियों के सवाल मन में हलचल मचने में कामयाब दिखाई देते है सबसे बड़ा सवाल तो यह है की जो मुद्रा मठ से बरामद हुई उसके नंबर एक सीरियल से कैसे हो सकते है जबकि करमापा का कहना है की वह दान में मिले है दान में मिली मुद्रा अलग-अलग स्थानों एवं लोगो के द्वारा दी जाति है और उस समय तब अलग-अलग सीरियल के नंबर होने चाहिए असल में मामला चाहे कुछ भी हो यहाँ पर कमी सरकारी नीतियों,विदेश विभाग,गुप्तचर विभाग और सबसे बड़ा दोष तो सत्ता पर बैठे शीर्ष लोगो का है जो केवल वोटबैंक के लिये आखे मूंदे बैठे है हमारे देश में तो खाने के लाले पड़े है ऊपर से अवैध बंगलादेशियो और तिब्बतियों का एक अलग ही बोझ अनचाहे में लद गया है देखा जाय तो भारत की नागरिकता हासिल करना तो महज़ एक मजाक बन गया है वोटबैंक की खातिर कितने ही बंगलादेशियो को राशन कार्ड पहचान पत्र तक आवंटित हो चले है
गौर करने वाली बात है की आखी भारत सरकार इसे अपनी कौन सी कूटनीति को साध रहा है दलाई लामा को अतिथि का दर्जा देना भी चीन के खिलाफ भारतीय रण निति का एक हिस्सा माना जाता है जबकि सवाल यह उठता है की आखिर कब तक सरकार दलाई लामा के कंधे पर बन्दूक रखकर चलाएगी ऊपर से कोढ़ में खाज़ ये की निशाना भी अक्सर चूक जाता है दलाई लामा अपने उम्र के आखिरी दहलीज़ पर खड़े है यहाँ एज फैक्टर देखना भी बहुत जरूरी है जब दलाई मर जायेगे तब भारत क्या करेगा किसका कन्धा ढूढ़ेगाअसल मर्ज़ को सरकार या तो जानती नहीं या फिर जानना ही नहीं चाहती आज स्थिति यह है की हमारे जितने भी पडोसी देश है उनमे भूटान को छोड़कर सभी देशो में कही न कही भारत विरोधी तत्व कार्यरत है जिंनको वह की सरकारे जानते हुए भी संरक्षण दे रही है यह उनकी विदेश निति का हिस्सा हो सकता है लेकिन भारत सरकार ने इसके बचाव में क्या किया है इसको जानने का हक़ आम भारतीयों को भी है जो इस देस में निवास करते है कही भी कुछ हुआ तो सरकारे सीधे पाक को दोषी ठहराकर अपनी इतिश्री कर लेते है जबकि असलियत कभी-कभी उलटी भी होती है जैसे मालेगांव या फिर अजमेर ब्लास्ट और यह निश्चित है भले ही मिडिया के मार्फ़त आम लोग इस हकीकत से वाकिफ हो जाय लेकिन कानूनी प्रक्रिया इतनी धीमी होगी की एक दिन अन्य केसों की तरह यह भी फाइलो के ढेर में फेक दी जाएगी
बाहर अपने पडोसी देशो के कुचक्र से पीड़ित यह देश अपने अन्दुरूनी ज़ख्मो से कम पीड़ित नहीं है नक्सलवाद की लहर दिनोदिन बढती जारही है और सरकार इस मामले में कभी मुखर तो कभी खामोश वाली स्थिति में है कभी आपरेशन ग्रीन हंट को समर्थन वाली बात की जाती है तो कभी वार्ता के बुखार से तड़पती हुई सरकार पाई जाती है अभी हाल ही में विनायक सेन को देशद्रोह के आरोप में जेल भेज दिया गया जिसका खुला विरोध भारत के प्रबुद्ध वर्ग ने किया लेकिन सरकारी पुलिस तो बहरी है झूठे मामले बनाकर एक बेहतरीन इन्सान को सलाखों के पीछे धकेल दिया गया क्या कसूर था उनका यही की उस आदमी ने जो गोल्ड मेडलिस्ट था जिसने अपने सुनहरे कैरियर को त्याग कर गरीबो के दर्द की परवाह की इस तरह के कृत्यों से ही नक्सल वाद पनपता है जिसक अंदाजा सरकार को नहीं या फिर ये जानबूझकर एसा करते है और कभी -कभी तो लगता है की ये जानबूझ कर किये जाते है ताकि इनके दमन के लिये पैसा आवंटित किया जाय और इन पैसो से सबकी मौज हो साथ ही साथ सामंती ठाट-बाट भी बनी रहे जो गरीब विरोध करता हो उसे नक्सली बनाकर गोली से उड़ा दो या फिर जेल की सलाखों के पीछे सड़ने के लिये छोड़ दो
कितना अफ़सोस होता है ये देखकर की देश के एक शीर्ष नेता गरीबो के झोपड़ियो में उनके दर्द को महसूस करने की नौटंकी करते है तो कोई राष्ट्र प्रेम दिखने के लिये तिरंगा फहराने का अभिनय करते है जबकि सच्चाई सबको पता है केवल और केवल वोटबैंक की खातिर| इस खतरनाक बीमारी से उबरना बहुत ही जरूरी है वरना पाक का भारत को कई हिस्सों में बताने का जो सपना है उसे भारत के नेता ही कभी न कभी पूर्ण कर देंगे जिसक खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ेगा चाहे वह अपराधी हो या निर्दोष
गौर करने वाली बात है की आखी भारत सरकार इसे अपनी कौन सी कूटनीति को साध रहा है दलाई लामा को अतिथि का दर्जा देना भी चीन के खिलाफ भारतीय रण निति का एक हिस्सा माना जाता है जबकि सवाल यह उठता है की आखिर कब तक सरकार दलाई लामा के कंधे पर बन्दूक रखकर चलाएगी ऊपर से कोढ़ में खाज़ ये की निशाना भी अक्सर चूक जाता है दलाई लामा अपने उम्र के आखिरी दहलीज़ पर खड़े है यहाँ एज फैक्टर देखना भी बहुत जरूरी है जब दलाई मर जायेगे तब भारत क्या करेगा किसका कन्धा ढूढ़ेगाअसल मर्ज़ को सरकार या तो जानती नहीं या फिर जानना ही नहीं चाहती आज स्थिति यह है की हमारे जितने भी पडोसी देश है उनमे भूटान को छोड़कर सभी देशो में कही न कही भारत विरोधी तत्व कार्यरत है जिंनको वह की सरकारे जानते हुए भी संरक्षण दे रही है यह उनकी विदेश निति का हिस्सा हो सकता है लेकिन भारत सरकार ने इसके बचाव में क्या किया है इसको जानने का हक़ आम भारतीयों को भी है जो इस देस में निवास करते है कही भी कुछ हुआ तो सरकारे सीधे पाक को दोषी ठहराकर अपनी इतिश्री कर लेते है जबकि असलियत कभी-कभी उलटी भी होती है जैसे मालेगांव या फिर अजमेर ब्लास्ट और यह निश्चित है भले ही मिडिया के मार्फ़त आम लोग इस हकीकत से वाकिफ हो जाय लेकिन कानूनी प्रक्रिया इतनी धीमी होगी की एक दिन अन्य केसों की तरह यह भी फाइलो के ढेर में फेक दी जाएगी
बाहर अपने पडोसी देशो के कुचक्र से पीड़ित यह देश अपने अन्दुरूनी ज़ख्मो से कम पीड़ित नहीं है नक्सलवाद की लहर दिनोदिन बढती जारही है और सरकार इस मामले में कभी मुखर तो कभी खामोश वाली स्थिति में है कभी आपरेशन ग्रीन हंट को समर्थन वाली बात की जाती है तो कभी वार्ता के बुखार से तड़पती हुई सरकार पाई जाती है अभी हाल ही में विनायक सेन को देशद्रोह के आरोप में जेल भेज दिया गया जिसका खुला विरोध भारत के प्रबुद्ध वर्ग ने किया लेकिन सरकारी पुलिस तो बहरी है झूठे मामले बनाकर एक बेहतरीन इन्सान को सलाखों के पीछे धकेल दिया गया क्या कसूर था उनका यही की उस आदमी ने जो गोल्ड मेडलिस्ट था जिसने अपने सुनहरे कैरियर को त्याग कर गरीबो के दर्द की परवाह की इस तरह के कृत्यों से ही नक्सल वाद पनपता है जिसक अंदाजा सरकार को नहीं या फिर ये जानबूझकर एसा करते है और कभी -कभी तो लगता है की ये जानबूझ कर किये जाते है ताकि इनके दमन के लिये पैसा आवंटित किया जाय और इन पैसो से सबकी मौज हो साथ ही साथ सामंती ठाट-बाट भी बनी रहे जो गरीब विरोध करता हो उसे नक्सली बनाकर गोली से उड़ा दो या फिर जेल की सलाखों के पीछे सड़ने के लिये छोड़ दो
कितना अफ़सोस होता है ये देखकर की देश के एक शीर्ष नेता गरीबो के झोपड़ियो में उनके दर्द को महसूस करने की नौटंकी करते है तो कोई राष्ट्र प्रेम दिखने के लिये तिरंगा फहराने का अभिनय करते है जबकि सच्चाई सबको पता है केवल और केवल वोटबैंक की खातिर| इस खतरनाक बीमारी से उबरना बहुत ही जरूरी है वरना पाक का भारत को कई हिस्सों में बताने का जो सपना है उसे भारत के नेता ही कभी न कभी पूर्ण कर देंगे जिसक खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ेगा चाहे वह अपराधी हो या निर्दोष
शनिवार, 28 अगस्त 2010
ममता+माओवादी=बंगाल फतह
राजनैतिक गलियारों में ममता कि हलचल साफ़ सुनाई दे रही है आने वाले बंगाल के चुनाव में कांग्रेस और अब तक के बेताज बादशाह रहे वाम दल के धुरंधरों को ममता के कठोर दाव का कोई काट नहीं मिल पा रहा रेल के सहारे बंगाल फतह करने की कोशिश में मशगूल ममता को मओवादियो से भी हाथ मिलाने में कोई गुरेज़ नहीं लालगढ़ की रैली इसका सबसे बड़ा सबूत है जिसमे हजारो माओवादी लड़ाको ने हिस्सा लिया असल में भारतीय राजनेताओ की कमजोरी हमेशा से सत्ता ही रही है येन केन प्रकरेण हमें सत्ता चाहिए यही लक्ष्य है और इस लक्ष्य को भेदने के लिये किसी भी नैतिक अनैतिक हथियार का इस्तेमाल वे जायज़ सम झते हैखैर बात यहाँ ममता की हो रही है जो बंगाल में एक नयी मायावती बनना चाहती है जिसके लिये मओवादियो से साठ गाठ करना उनकी अब मजबूरी हो गयी है "सत्ता से ज्यादा दिन दूर रहना तो अखरता ही है"
लेकिन उन्हें शायद ये आभास नहीं है की शेर की सवारी करना हमेशा घातक होता है जब तक आप शेर की पीठ पर बैठे हो तब तक तो ठीक है लेकिन जिस दिन उसकी पीठ से खिसके वो दिन आखिरी दिन हो जाता है चूकि यहाँ मओवादियो को भी अपनी सुरक्षा और सहूलियत के लिये एक ऐसे कंधे की जरूरत है जो की ममता मैया से पूरी होती दिखाई दे रही है और इधर ममता के लक्ष्य की पूर्ती इन मओवादियो से हाथ मिलाने में ही दिखाई दे रही है
आइना एकदम साफ़ है दोनों अपने हितो की पूर्ती हेतु एक दूसरे को गाठना चाहते है लेकिन यहाँ यह भी देखना जरूरी है क्या ममता सत्तानशीं होने के बाद मओवादियो के समस्त हितो को पूर्ती कर पायेगी? शायद नहींफलस्वरूप मओवादियो का प्रचंड रूप तो ममता के कार्यकाल में दिखाई देने की संभावना है
किसी भी देश में तख्तापलट कर सत्ता को कब्जाना और साम्यवाद को फैलाना मओवादियो का एकमात्र धर्म है इसके लिये वे तीन चरणों में काम करते है पहले चरण में वे जनमानस के बीच घुलते मिलते है दूसरे चरण में उनकी परेशानियों को लेकर विद्रोह का वातावरण तैयार करते है और राजनैतिक दलो में सेंधमारी करते है आखिरी चरण में संवाद और तलवार की ताकत से सत्ता के शीर्ष पर पहुँच जातें है जैसा की नेपाल में उन्होंने कमल दहल प्रचंड के नेतृत्व में किया इससे इनके हौसले बुलंद है की एक दिन हिंदुस्तान भी साम्यवाद को अपना लेगा जिसमे आर्थिक रूप से मदद चीन और अन्य शत्रु देशो द्वारा होता है जो भारत को लगातार अस्थिर करने की कोशिश में लगे रहते है जैसा की मीडिया में खबर आई थी की मओवादियो ने पाक परस्त आतंकी संगठन से गठजोड़ कर लिया यह खबर इस अंदाजे की पुष्टि करने के लिये काफी है
और इधर अपनी सरकार को बचाने की कवायद में भारत की सबसे पुरानी पार्टी अपने रेलमंत्री पर भी लगाम नहीं लगा पा रही आये दिन रेल हादसों के बीच भी शायद ममता जी को उन गरीब लोगो की आवाज़ नहीं सुनाई दे रही जो इन दुर्घटनाओ में अपनों की जान गवा बैठे है इन्हें तो बस फिक्र है केवल और केवल अपनी कुर्सी की
एक सवाल मन में हलचल मचाता रहता है आखिर कब जनता की चेतना जागेगी और कब दूसरी आजादी का बिगुल बजेगा
रविवार, 15 अगस्त 2010
दोषी कौन-नक्सली या सरकार
शुक्रवार में पढ़ा "नक्सलियों का दुश्मन " यह दुश्मन कोई इन्सान नहीं एक कुत्ता है जिसे भारत सरकार ने नक्सलियों से लोहा लेने के लिये विदेश से मगवाया है ये बेल्जियम शेफर्ड कुत्ते इस्रायली मैलिनावा और अमेरिकी मादा की क्रास औलाद है जिसे भारत सरकार छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में तैनात करना चाहती है इनको गोला बारूद सूघने की ट्रेनिग देने के पश्चात् इन्हें सी आर पी ऍफ़ के साथ तैनात किया जायेगा
अब सवाल ये उठता है की क्या ये उस भ्रष्ट तंत्र को भी सूघ पायेगे जिसकी वजह से हमारे जवान शहीद होते है क्या ये उस गन्दी राजनीती को सूघ पायेगे जो नक्सलियों के नाम पर खेले जाते है या फिर जनता को एक बार फिर से मूर्ख बनाने की तयारी की जा रही है
इसके पहले आउटलुक पत्रिका में अरुधंति राय का इंटरव्यू पढ़ा था जिसमे सुश्री राय ने अपने कुछ कीमती पल नक्सलियों के बीच उनकी व्यथा सुनते हुए गुजारी थी जिसका निष्कर्ष यह था की नक्सली अपनेआप को,अपने ज़मीं को,अपने लोगो को भारत सरकार से बचाने के लिये सशस्त्र सघर्ष कर रहे है काफी कुछ बाते भी थी जो दिल को हिला देने वाली भी थी सरकारी अधिकारियो का ख़राब बर्ताव उदहारण के तौर पर वन विभाग के अधिकारी तभी आदिवासियों के गावो में जाते थे जब उन्हें मुर्गी या लड़की की ज़रुरत होती थी या फिर अपने ज़मीं की खेती के लिये मजदूरों की ज़रुरत पड़ने पर आदिवासियों का प्रयोग बंधुवा मजदूरी के लिये करना होता है
माना जा सकता है ऐसी घटनाओ में सत्यता ज़रूर होती होगी पूरी तरह से प्रशासन अपने आप को निर्दोष और आदिवासियों को दोषी नहीं करार दे सकता लेकिन अरुदंती जी को केवल इतना देखकर संतुष्ट हो जाना ठीक है?
मै उन्हें गलत नहीं समझता लेकिन उन्हें कुछ और अन्दर तक जाना चाहिए की कैसे नक्सली देश और सरकार को चोट पहुचने के लिये खतरनाक योजनाये बनाते है और सबसे बड़ा सवाल इनका आका कौन है?कही चीन तो नहीं
इन्हें हथियार कौन मुहैया करता है?इनके बन्दूको में गोली कौन भरवाता है?और सबसे बड़ी बात-कौन है जो अपने विचारो को इनके विचारो में घोलता है और कैसे?
माओ ने कहा था क्रांति बन्दूक की नली से प्रवाहित होती है जिसे माओ ने सच कर दिखाया था लेकिन यह भी तो देखिये की उस चीन को विदेसियो से खतरा था ये नियम हर जगह लागू नहीं हो सकता खासतौर से भारत में यहाँ हम किसके खिलाफ लड़ रहे है और कौन सी आज़ादी माग रहे है इस सन्दर्भ में "एक नक्सली की डायरी " आँखे खोल देने वाला व्यक्तत्व है जिसे एक नक्सली कामरेड ने लिखा था -मार्च १९७३ में भद्राचलम के कालेज से निकलकर किस तरह उसने जवानी की उन्माद में जंगल का रूख किया और १९७३ से २०१० तक उसने क्या खोया क्या पाया सारांश यह था की नक्सली आन्दोलन एक केवल एक छलावा है ठीक उसी तरह जिस तरह से हमारे प्यारे नेताओ के वादे अंतर केवल शब्दों के हेरफेर का है(एक नक्सली की डायरी ,अमर उजाला ६जून २०१०)
अफ़सोस तो इस बात का है की हमारे देश के निति-नियंता सब कुछ जानते हुए भी खामोश है वो भी महज़ चन्द वोटो और नोटों के किये ताकि इन्हें सत्ता की मलाई मिलाती रहे इनके लिये चाहे देश के जवान मरे जाये या वो बदनसीब आदिवासी या कथित माओवादी जिन्हें खुद नहीं पता की वो क्या कर रहे है?
अब सवाल ये उठता है की क्या ये उस भ्रष्ट तंत्र को भी सूघ पायेगे जिसकी वजह से हमारे जवान शहीद होते है क्या ये उस गन्दी राजनीती को सूघ पायेगे जो नक्सलियों के नाम पर खेले जाते है या फिर जनता को एक बार फिर से मूर्ख बनाने की तयारी की जा रही है
इसके पहले आउटलुक पत्रिका में अरुधंति राय का इंटरव्यू पढ़ा था जिसमे सुश्री राय ने अपने कुछ कीमती पल नक्सलियों के बीच उनकी व्यथा सुनते हुए गुजारी थी जिसका निष्कर्ष यह था की नक्सली अपनेआप को,अपने ज़मीं को,अपने लोगो को भारत सरकार से बचाने के लिये सशस्त्र सघर्ष कर रहे है काफी कुछ बाते भी थी जो दिल को हिला देने वाली भी थी सरकारी अधिकारियो का ख़राब बर्ताव उदहारण के तौर पर वन विभाग के अधिकारी तभी आदिवासियों के गावो में जाते थे जब उन्हें मुर्गी या लड़की की ज़रुरत होती थी या फिर अपने ज़मीं की खेती के लिये मजदूरों की ज़रुरत पड़ने पर आदिवासियों का प्रयोग बंधुवा मजदूरी के लिये करना होता है
माना जा सकता है ऐसी घटनाओ में सत्यता ज़रूर होती होगी पूरी तरह से प्रशासन अपने आप को निर्दोष और आदिवासियों को दोषी नहीं करार दे सकता लेकिन अरुदंती जी को केवल इतना देखकर संतुष्ट हो जाना ठीक है?
मै उन्हें गलत नहीं समझता लेकिन उन्हें कुछ और अन्दर तक जाना चाहिए की कैसे नक्सली देश और सरकार को चोट पहुचने के लिये खतरनाक योजनाये बनाते है और सबसे बड़ा सवाल इनका आका कौन है?कही चीन तो नहीं
इन्हें हथियार कौन मुहैया करता है?इनके बन्दूको में गोली कौन भरवाता है?और सबसे बड़ी बात-कौन है जो अपने विचारो को इनके विचारो में घोलता है और कैसे?
माओ ने कहा था क्रांति बन्दूक की नली से प्रवाहित होती है जिसे माओ ने सच कर दिखाया था लेकिन यह भी तो देखिये की उस चीन को विदेसियो से खतरा था ये नियम हर जगह लागू नहीं हो सकता खासतौर से भारत में यहाँ हम किसके खिलाफ लड़ रहे है और कौन सी आज़ादी माग रहे है इस सन्दर्भ में "एक नक्सली की डायरी " आँखे खोल देने वाला व्यक्तत्व है जिसे एक नक्सली कामरेड ने लिखा था -मार्च १९७३ में भद्राचलम के कालेज से निकलकर किस तरह उसने जवानी की उन्माद में जंगल का रूख किया और १९७३ से २०१० तक उसने क्या खोया क्या पाया सारांश यह था की नक्सली आन्दोलन एक केवल एक छलावा है ठीक उसी तरह जिस तरह से हमारे प्यारे नेताओ के वादे अंतर केवल शब्दों के हेरफेर का है(एक नक्सली की डायरी ,अमर उजाला ६जून २०१०)
अफ़सोस तो इस बात का है की हमारे देश के निति-नियंता सब कुछ जानते हुए भी खामोश है वो भी महज़ चन्द वोटो और नोटों के किये ताकि इन्हें सत्ता की मलाई मिलाती रहे इनके लिये चाहे देश के जवान मरे जाये या वो बदनसीब आदिवासी या कथित माओवादी जिन्हें खुद नहीं पता की वो क्या कर रहे है?
शनिवार, 20 मार्च 2010
नारी
"यत्र नार्यस्त पूज्यते रमन्ते तत्र देवता" बहुत पहले ही यह बात कहकर भारतीय समाज ने नारी जाति को एक प्रतिष्ठित पद दे दिया था लेकिन जिस तरह से अन्य सामाजिक मान्यताये धूमिल होती चली गयी ठीक उसी तरह से
इस स्लोक को भी हमारा समाज भुला बैठा|आज नारी जाति के वस्तुस्थिति का आकलन किया जाय तो हम पाते है की स्थिति बद से बदतर की ओर अग्रसर हो चली है|ज़रा गौर फरमाए इन आकणो पर जो जनगड़ना २००१, राष्ट्रिय मानव विकास रपट २००१,एस आर एस मातृत्व मृत्यु अध्ययन २००६ के सर्वे में नतीजो के रूप में खुलकर एक भयावह कहानी खुद बया कर रहे है|
इस स्लोक को भी हमारा समाज भुला बैठा|आज नारी जाति के वस्तुस्थिति का आकलन किया जाय तो हम पाते है की स्थिति बद से बदतर की ओर अग्रसर हो चली है|ज़रा गौर फरमाए इन आकणो पर जो जनगड़ना २००१, राष्ट्रिय मानव विकास रपट २००१,एस आर एस मातृत्व मृत्यु अध्ययन २००६ के सर्वे में नतीजो के रूप में खुलकर एक भयावह कहानी खुद बया कर रहे है|
वही उत्तर प्रदेश में महिला और पुरुष के बीच साक्षरता का अंतर २७ प्रतिशत है इसके साथ ही घरेलू हिंसा और नारियो पर अत्याचार के न जाने कितने मामले हमारे और आपके बीच होते रहते है हर उन्सठ मिनट पर एक महिला का बलात्कार हो जाता है और दहेज़ हत्या के तो अनगिनत मामले है जो कई कारणों से समाज के सामने नहीं आ पाते घरेलू हिसा के लगभग ९० प्रतिशत मामले तो घर की कोठरी में कैद रह जाती है ज़रा सोचिये वह पीड़ित महिला कौन है?किसी की माँ किसी की बेटी किसी की बहन किसी की पत्नी का रूप होती है नारी धैर्य से भरी हुई त्याग की मूर्ती होती है नारी|एक लड़की जो तक़रीबन बीस साल तक किसी एक घर में अपनों के बीच में होती है और अचानक ही उसे किसी दूसरे घर ,दूसरे समाज,दूसरे परिवेश में भेज दिया जाता है और वो चुपचाप उस परिवेश को आत्मसात भी कर लेती है क्या पुरुष जाति एसा कर सकता है?शायद नहीं फिर भी उसे अधिकांसतह इन्हे इनका हक़ नहीं मिलता|
सरकार के द्वारा कई कानूनों को भी बनाया गया है लेकिन क्या कानून के डंडे के ही जोर से ही समाज इन्हे इनका हक़ दे सकता है यह सवाल सोचनीय है|ज़रुरत है तो केवल और केवल अपनी विकृत सोच को बदलने कीचाहे वह पुरुष हो या महिला जब तक अपनी सोच को अपनी नजरिये को नहीं बद्लेगे तब तक किसी भी कानून से नारी जाति का भला नहीं हो सकता और जब तक नारी जाति का भला नहीं हो सकता तब तक किसी देश किसी समाज का मज़बूत और सुव्यवस्थित रहना अधर में है|
शुक्रवार, 19 मार्च 2010
तेरह फरवरी
तेरह फरवरी सन दो हजार दस ,यह कोई एतहासिक तारिख नहीं जिसका पता सबको हो लेकिन किसी परिवार के लिये यह एक न भूलने वाली काली तारिख है|आजमगढ़ के एक छोटे से गाँव परागद्दी के रहने वाले रामयश प्रजापति की बेटी सोंद्रिका देवी की शादी पाँच वर्ष पहले धर्मेन्द्र प्रजापति ग्राम जेहरा पिपरी में होती है शादी के कुछ दिन के बाद से ही उस मासूम का शोषण ससुरालवालों की तरफ से शुरू हो जाता है पाँच साल के लम्बे अन्तराल के बाद ठीक तेरह फरवरी को उसकी गला दबाकर न्रिशंश तरीके से हत्या कर दी जाती है और अपराधी पैसे की ताकत से समाज में छुट्टा घूमता है
यह किसी फिल्म की कहानी नहीं बल्कि एक ह्रदय विदारक सच्ची घटना है तमाम प्रयासों के बावजूद भी मृतका के सम्बन्धी न्याय की तलाश में इधर-उधर भटकने पर मजबूर है प्रशासन खामोश बैठा है किसी तरह दबाव डालने पर ऍफ़ आइ आर तो लिख ली जाती है लेकिन कारवाही के नाम पर सिफ़र ही हाथ में आता है और सबसे बड़ी बात तो यह है की समाज का चौथा स्तम्भ यानि की "मिडिया" भी इस मामले में अपनी चिर-परिचित फूर्ती दिखने में असमर्थ हो जाता है वह इंतजार कर रहा है की इस मुद्दे को कब भुनाया जाय|
ऐसी न जाने कितनी सोंद्रिका देवी को अचानक लाश में तब्दील कर दिया जाता है और हमारे कान में जू तक नहीं रेगती आखे तभी खुलती है जब इस तरह की कोई घटना हमारे ही साथ हो जाती है तब हम चिल्लाते है प्रशासन के खिलाफ,भ्रष्टाचार के खिलाफ,अत्याचार के खिलाफ और उन दुर्दांत हत्यारों के खिलाफ जो की एसा जघन्य अपराध करके भी समाज में हिंसक पशु की तरह घूम रहे होते है|
ऐसी ही न जाने कितनी सोंद्रिका दहेज़ की बलिवेदी पर कुर्बान कर दी जाती है और समाज खामोश रहता है अगली सोंद्रिका के मरने के इंतजार में आखिर कब तक ज़रा सोचिए .....................
यह किसी फिल्म की कहानी नहीं बल्कि एक ह्रदय विदारक सच्ची घटना है तमाम प्रयासों के बावजूद भी मृतका के सम्बन्धी न्याय की तलाश में इधर-उधर भटकने पर मजबूर है प्रशासन खामोश बैठा है किसी तरह दबाव डालने पर ऍफ़ आइ आर तो लिख ली जाती है लेकिन कारवाही के नाम पर सिफ़र ही हाथ में आता है और सबसे बड़ी बात तो यह है की समाज का चौथा स्तम्भ यानि की "मिडिया" भी इस मामले में अपनी चिर-परिचित फूर्ती दिखने में असमर्थ हो जाता है वह इंतजार कर रहा है की इस मुद्दे को कब भुनाया जाय|
ऐसी न जाने कितनी सोंद्रिका देवी को अचानक लाश में तब्दील कर दिया जाता है और हमारे कान में जू तक नहीं रेगती आखे तभी खुलती है जब इस तरह की कोई घटना हमारे ही साथ हो जाती है तब हम चिल्लाते है प्रशासन के खिलाफ,भ्रष्टाचार के खिलाफ,अत्याचार के खिलाफ और उन दुर्दांत हत्यारों के खिलाफ जो की एसा जघन्य अपराध करके भी समाज में हिंसक पशु की तरह घूम रहे होते है|
ऐसी ही न जाने कितनी सोंद्रिका दहेज़ की बलिवेदी पर कुर्बान कर दी जाती है और समाज खामोश रहता है अगली सोंद्रिका के मरने के इंतजार में आखिर कब तक ज़रा सोचिए .....................
मंगलवार, 8 दिसंबर 2009
चीटी-एक अनमोल कृति
चीटी इश्वर की सबसे अनमोल कल्पना का साक्ष्य रूप जो इस धरा पर सैकणों वर्षो से कार्यरत है निरंतर बिना किसी स्वार्थ के अपने लक्ष्य को भेदती चली आ रही है अनेक विद्वानों का कहना है की इश्वर की सबसे अनमोल कृति मनुष्य है लेकिन मै इस सत्य को पूर्ण रूप से स्वीकार करने में असमर्थ हु क्योकि आज मुझे मनुष्य से भी अनमोल कृति प्राप्त हुई है वह है "चीटी " सोचने में कितना विचित्र लगता है की यह छोटा सा जीव मनुष्य जैसे भीमकाय और शक्तिशाली प्राणी से किस तरह श्रेष्ठ है परन्तु यही सत्य है और इसका सबसे बड़ा प्रमाण है परोपकार। चीटी जो मनुष्य की तरह अपने भीतर स्वार्थ को नही रखती निरंतर केवल एक दूसरे के लिए हमेशा खाद्य संचय करने में जुटी रहती है और इस प्रयास में कितनो को अपने प्राणों की आहुतिया देनी पड़ती है परन्तु वह बिना स्वार्थ के अपने कार्य को सम्पन्न करने में जुटी रहती है कितना निर्छल है इनका संसार,चीटी एक बहुगुणी और स्रमवान प्राणी मेरे मतानुसार इस धरा पर चीटी जैसा श्रमवान जीव कही भी शायद ही मिल जाय,अथक मेहनत विष्वास और पूर्ण लगन से मेहनत करने वाली जीव चीटी । आज जबकि मनुष्य हर प्रकार के ईश्वर विरोधी कार्यो में लींन है जिसे हमारे मानव समुदाय के कुछ प्राणी अपने ऊपर के दोषों को नज़रंदाज करके ये कहते है की"भइया कलियुग है इस युग में ऐसे कार्य तो होते रहेगे" लेकिन कोई ये नही सोचता की इस कलियुग को हम सतयुग में कैसे बदल सकते है हम भगवान् राम तो नही पर कुछ उनकी तरह कार्य तो कर ही सकते है ये सब देखकर मुचे चीटिया ही ठीक लगती है जिन्हें कलियुग भी नही हरा सका अजेय चीटिया,समझ में नही आता इस चोटी सी काया में कितनी ताकत है की ये सतियुग में में भी प्रगतिशील थी और आज कलियुग में भी उसी तरह स्वार्थहीन और प्रगतिशील है "क्या मनुष्य चीटी के जितना भी साहसी नही क्या वो एक चीटी से हार गया"यह कहना अब अनुचित न होगा । आज मै मानव और चीटियों को देखकर तुलना करता हु तो मुझे ये नन्ही नन्ही चिटिया ही विशालकाय शरीर वाले इंसानों से कई गुना श्रेष्ठ लगती है सचमुच चिटिया ही आज तक ईश्वर के नियमो का पालन करने में सक्षम रही है ईश्वर की सभी कृतियों को तुलनात्मक ढंग से देखा जाय तो श्रेष्ठता की पदवी मानव समुदाय को नही बल्कि इन चीटियों को दे देना चाहिए आज अगर ईश्वर अपने निवास से कही इस धरा का अवलोकन कर रहा होगा तो उसे कितना दुःख पहुचेगा वह सोचने के लिए विवश हो जाएगा की मेरी यह सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य जिसे मैंने अपने तन मन से निर्माण किया था आज वह धूल-धूसरित होगया जिसे मैंने सदैव अच्छे और धर्म के रस्ते पर चलने का उपदेश दिया वो आज सभी प्रकार के कुकर्मो को किए जा रहा है और अगर यह सोचते हुए उसकी निगाह यदि चीटियों पर पड़ गई तो वह उसे निष्चित ही अपनी अनमोल कृति मान लेगा और अगर एसा हुआ तो मानव समाज एक जहरीला कीड़ा बनके रह जायगा अगर सही समय पर मनुष्य ने इन चीटियों की नक़ल करके अपने को न सुधार तो मानव समाज में प्रलय मच जायगी जिसका जिम्मेदार ख़ुद मानव समाज होगा ।
बुधवार, 2 दिसंबर 2009
रामलीला
रामलीला अर्थात भगवन श्रीरामचंद्र के संपूर्ण जीवन को कलाकारों द्वारा रंगमंच पर किया गया अभिनय संचार के विकास क्रम में नुक्कड़ नाटक ,नौटंकी ,नाच और रामलीला का अपना एक विशेष स्थान हुआ
करता था जिसमे रामलीला तो अपने चरम पर था भगवन श्रीरामचंद्र की धार्मिक महागाथा का मंचन जब कलाकारों द्वारा किया जाता था तब दर्शको का मन श्रद्धा से भर उठता था।आज मै अपने गाव की रामलीला के बारे में बताना चाहता हू तो ध्यान दीजिए क्योकि एक शब्द भी आपसे छूट गया तो फ़िर न पा सकेगे।पूर्वांचल क्षेत्र में सबसे प्राचीन और अनवरत चलने वाली रामलीला में अगर सर्वप्रथम सराय हरखू या फ़िर गुलजार गंज की रामलीला को माना जाता है तो वही रामदयाल गंज की रामलीला का भी स्थान बहुत पीछे नही है।तक़रीबन १९५६ के पहले ही इस रामलीला की आधारशिला रखी जा चुकी थी गाव के ही एक सज्जन श्री शंकर जी के कठिन प्रयासों से इसकी शुरुवात लगभग १९४८ में हो चुकी थी तब न तो रंगमंच के नाम पर स्टेज का प्रबंध था और न ही ड्रेस के नाम पर कपड़ो का और डायलाग के नाम पर इन सीधे -सादे ग्रामीणों के पास एक ही वाक्य था "ले लेई था "सुनने में बहुत अजीब महसूस होता होगा लेकिन संप्रेषण के नाम पर यह शब्द ही आने वाली विकसित रामलीला की नीव का पत्थर साबित हुआ । दशहरे के दिन खेले जाने वाली इस रामलीला में पात्रो को दो वर्गों में बाट दिया जाता थाएक पक्ष रावण की सेना मानी जाती थी जिसे दुष्टों की सेना की संज्ञा दी गई थी तो दूसरी तरफ राम की सेना होती थी जिसे नारायण की सेना के नाम से पुकारा जाता था।मेकअप के नाम पर केवल कोयले के चूरे का प्रयोग होता था जिसे पानी में मिलाकर मुह पर मल लिया जाता था।लकड़ी का तलवार और कपड़े के ऊपर पुराने बोरा का इस्तेमाल किया जाता था। इन्ही हथियारों से सुसज्जित राम और रावण की सेनाये तब के डाइरेक्टर शंकर जी के इशारे पर एक दुसरे पर टूट पड़ते थे और श्रीरामचंद्र जी रावण का संहार कर देते थे और यकीन मानिये उस समय दर्शको की संख्या का अंदाज़ा लगाना बहुत ही कठिन होता था।राम के द्वारा रावण के वध के बाद श्रीरामचंद्र की जय घोष समस्त गाव में सुनाई पड़ता था।अक्टूबर १९५७ में रामलीला का विधिवत शुरुवात हुई जिसमे मंच बनाया गया उस समय रामचंदर लेखपाल (औरा जमालपुर )ने सराय हरखू जाकर पंडित बेनी प्रसाद सिन्हा द्वारा लिखित रामलीला किताब को ले आए और प्रथम बार रामलीला का मंचन किताब के द्वारा विधिवत किया गया। स्टेज के आलावा परदे और वस्त्र के लिए सरकारी मदद ली गई और ब्लाक पर से इसकी व्यवस्था हुई वस्त्रो में कुरता,चुस्तियार प्रचलन में थे। उस समय रामलीला में गीतों व् गायन का कोई स्थान नही था केवल शब्दों के द्वारा ही रामलीला सम्पन्न होती थी बाद में काफी सुधार हुआ गायन और संगीत का मधुर समावेश होने लगा। मनोरंजन के नाम पर ग्रामीणों के लिए एक खास अवसर होती थी रामलीला, दर्शक वहा दर्शक के रूप में नही बल्कि यु कहिये वे श्रद्धालू के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे जब श्रीरामजी मंच पर आते तो समस्त प्रागण में जय श्रीराम का उद्घोष आज भी हमारे बुजुर्गो के ज़ेहन में ताजा है और जब लक्ष्मण को शक्ति बाड़ लगती और राम विलाप कराने लगते थे तब दर्शको की भी हिचकिया बंध जाती थीकहने का अर्थ है लोग भावनात्मक रूप से जुड़े थे। १९५७ से शुरू रामदयाल गंज की रामलीला आज भी अनवरत जारी है तब से लेकर आज तक काफी बदलाव आ चुका है दर्शको में भावना का लोप हो चला है लेकिन रंगमंच पर कलाकारों द्वारा किया जाने वाला अभिनय आज भी बेजोड़ है। बात जब रामलीला की हो रही हो तो रंगमंचकर्मी महबूब अली की बात न करना इस लेख में अधूरापन भरता है १९५७ से आज तक अनवरत अपनी सेवाए देते आए है महबूब। लगभग सभी प्रमुख पात्रो का किरदार अपने ज़बरदस्त अंदाज़ में निभा चुके महबूब अली रामदयाल गंज की रामलीला की जीवित किदवंती बने हुए है। अभिनय के साथ-साथ इन्होने रामलीला की पुस्तक में गीतों और कई धुनों का समावेश भी किया है। और अगर आप एक मुस्लिम कलाकार को रामलीला में देखकर चौक रहे है तो धीरज रखिये क्योकि आगे भी और कई मुस्लिम चहरे मिलेगे मेरे गाव की रामलीला में। हिंदू-मुस्लिम एकता की अद्भुत मिसाल रखने वाली यह रामलीला अन्यत्र कही देखने को शायद ही मिले। मेरी बात का भरोसा न हो तो चले आइए कभी हमारे गाव ................
गुरुवार, 26 नवंबर 2009
नक्सलबाड़ी
झारखण्ड के चेतरा जिले में एक सास्कृतिक कार्यक्रम के दौरान नक्सली हमला जिसमे नौ लोग हताहत हुए ,उड़ीसा के मयुरभंज जिले में फ़ुटबाल मैच के पुरस्कार वितरण के समय गोलिया दन्दनायी जिसमे तीन जाने चली गई चतरा के नवाडीह मिडिल स्कूल को बम से उड़ाया,इसरी में अजमेर शरीफ की जियारत में जा रहे बस में सवार जायरीनों पर प्राणघातक हमला जिसमे बारह लोग गंम्भीर रूप से घायल हुए और तो और छात्रधर महतो के रिहाई के लिये राजधानी एक्सप्रेस तक को अगवा कर लिया जाता है वह भी पूरे पांच घंटे तक ये तो महज़ फ़िल्म का ट्रेलर है आगे भी बहुत कुछ और है जो अक्सर खबरों में आता रहता है नक्सलबाड़ी गाव से उठी ये आवाज आज नक्सलपंथ का रूप अख्तियार कर चुकी है १९६७ में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गाव के स्थानीय जमीदारों के खिलाफ जो युवाओ का चेहरा था आज वो अधिक विकृत नजर आता है उनकी हिसक गतिविधियों ने पूरे प्रशासन को चुनौती दी तब काग्रेसी नेता सिद्धार्थ शंकर राय मुख्यमंत्री थे नक्सलपंथ को ख़त्म करने का आदेश दिया गया जुलाई -अगस्त १९७१ में सेना के कोई ४०००० जवान तैनात किए गए धर पकड़ चालू हुआ और ४५ दिन की कवायद में ही सारा काम पूरा हो गया १९७२ में चारू मजुमदार को पकड़ा गया जिसकी मौत पुलिस हिरासत में हुई किसी भी राष्ट्र के लिए ये बहुत बड़ी शर्मिंदगी की बात होती है लेकिन भारतीय पुलिस का यह पराक्रम तो आदि से है प्रधानमंत्री ने पुलिस प्रमुखों के सम्मलेन में भी नक्सली हिंसा को बड़ी चुनौती बताया लेकिन केन्द्र तब से एक सूत भी आगे नही चली सिर्फ़ झारखण्ड में ही ३२९ से ज्यादा पुलिसकर्मी नक्सलपंथ की भेट चढ़ चुके है। झारखण्ड जहा २००३ में लगभग चार जिले नक्सली समस्या से ग्रस्त थे वही २००९ में दशा यह है की चौबीस में से बाईस जिलो में इनका वर्चस्व स्थापित हो चला है पश्चिम बंगाल ,बिहार ,आँध्रप्रदेश ,झारखण्ड ,महाराष्ट्र यूपी सहित बाईस राज्य नक्सलवाद के लाल सलाम के आगे नतमस्तक हो चले है अपरहड़,वसूली ,लेवी से प्राप्त धनो का आकड़ा इसी बात से लगाया जा सकता है की आज नक्सलियों की कुल वार्षिक आय १५००० करोड़ रू है यानि की बिहार राज्य के वार्षिक आय से भी ज्यादा अपने मूल मकसद से भटक चली यह संस्था आज सरकार के गले की सबसे बड़ी फास बन चुकी है "माओ ने यह सीख थी थी की कोई भी क्रांति तब तक सफल नही हो सकती जब तक कम्युनिस्ट जनता के बीच उसी तरह से सहज रूप से नही घुल मिल पाते ,जैसे जल में मछली रहती हो जाहिर है बन्दूक के जोर पर एसा नही हो सकतादिमाग में कई यक्ष प्रश्न दौड़ रहे है नक्सलपंथ का मकसद क्या है क्या वे सरकार के सामानांतर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहते है या मजलूमों के हक़ की लड़ाई लड़ना ज़ाहिर है गरीबो के हक़ में लड़ने के लिए उनके साथ अपना खून पसीना एक करना होगा बजाय इसके की मासूम जनता का ही बेदर्दी से कत्ल कर दिया जाय वही दूसरी तरफ़ सवाल उठता है की क्या इनसे निपटने का सरकार का तरीका कितना सही था कोबाद गाँधी ,छात्रधर महतो को महज जेल भेज देने या गृहमंत्री महोदय के एलान करने से की नक्सलियों से सख्ती से निपटा जायगा इस समस्या का हल होता नही दिख रहा बार बार बुधिजिवियो के चेताने के बावजूद भी सरकार की योजना कभी इस पार तो कभी उस पार वाली नज़र आती है।शरीर का कोई अंग सड़ जायतो उसे काट कर फेका जा सकता है लेकिन जब दिल में ही नासूर हो तो उसका हल केवल इलाज ही है जरूरत है मर्ज को समझाने की और इलाज को इजाद करने का जो की भविष्य के गर्त में है।
रविवार, 4 अक्टूबर 2009
भारतीय रेल
एक तरफ टकटकी लगाये लोगो का हुजूम ,हर इंसान की जुबा पर एक ही चर्चा "अभी नही आई अब तक आ जाना चाहिए था "ज्यादा मत सोचिये ये लोग किसी मंत्री या अभिनेत्री की राह नही देख रहे बल्कि अपनी मंजिल की तरफ जाने वाली ट्रेनों के इंतजार में है नज़ारा है रेलवे स्टेशन का ,आवाम बदली सरकारे बदली लेकिन नही बदली तो केवल भारतीय रेल व्यवस्था कल मेरे मोबाईल पर एक मेसेज आया जिसमे मेरे मित्र ने एक सवाल किया था की दुनिया की सबसे लम्बी टायलेट कहा पर है ?सवाल पढ़कर मै सोचने लगा फ़िर मैंने उससे कहा भाई कुछ हिंट तो दो जवाब में बताया गया यह टायलेट हजारो किलोमीटर लंबा है सुनकर मै चकरा गया इतना लंबा टायलेट कही हो सकता है थकहार कर मैंने उससे कहा यार अब जवाब भी बता दो ये मेरी समझ के बाहर है तो उसने जवाब भेजा " भारतीय रेलवे ट्रेक "सुनकर हसी छुट गई लेकिन सोचिये क्या यह उत्तर ग़लत है दुनिया भर में दूसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क हमारा है पता नही कितनी ट्रेने प्रतिदिन चलती रहती है देस की आय का एक बहुत बड़ा जरिया है भारतीय रेलवे और हमें जानने समझने का पूरा हक़ है की हमारे इन पैसों का व्यय या सदुपयोग हमारी भले के लिए किस हद तक खर्च किया जाता है आज जबकि ट्रेनों का कम्पुतिरिकरण हो चला है अत्याधुनिक मशीने इस कार्य में लग चुकी है बावजूद इसके आज भी हमारे यहाँ ट्रेने नेताओ की तरह हमेसा लेट आती है और इनके कारणों में एक है रेलवे ट्रेको का सुचारू रूप से न होना बहुत सी ऐसी जगह जहा पर आज भी डबल ट्रेक की व्यवस्था नही हो पाई है (विधुतीकरण की बात ही छोडिए)साथ ही साथ प्रबंधन की दिक्कते भी शामिल है दुनिया में दूसरा सबसे ज्यादा कर्मचारियों वाला यह विभाग अपनी जिम्मेदारियों से हमेशी ही भागता रहा है सुरक्षा की अगर बात की जाय तो तस्वीर और भी बुरी नज़र आती है आयेदिन ट्रेनों में पड़ने वाली दकैतियाऔर जहरखुरानी की घटना तो आम बात हो चली है इसकी जिम्मेदारी न तो सरकार लेती है और न ही रेलवे अधिकारी सुरक्षाबलो की तो बात ही छोडिए ये महोदय तो केवल अपनी जेबे गर्म करने के चक्कर में लगे रहते है पकड़ा उन्हें जाता है जो बेकसूर होते है बात तो यहाँ तक सुनाई देती है की डकैतों और जहरखुरानों से रेलवे पुलिस की सठ्गठ भी होती एक निश्चित रकम या यो कहिये की लूट में एक हिस्सा इनके नाम चढाया जाता है अख़बार वालो की दया से खबरे यहाँ तक आई है की सुरक्षाबलो द्वारा भी लूट की घटना को अंजाम दिया गया है दो चार दिन हो हल्ला मचता है खबरनवीस अपने कलम की कुछ स्याही और कागजों के कुछ पन्ने काले करते है फ़िर सब कुछ सामान्य हो जाता है चोर ,उठैगिरो ,डकैतों और जहार्खुरानो का धंधा फ़िर से सुचारू रूप से चालू हो जाता है परेशां होता है तो सिर्फ़ आम आदमी जिसे जल्द से जल्द अपने मंजिल तक पहुचना होता है बात अगर परेशानियों या सरकार की शिकायतों की करे तो एक नही कई कागजों के ढेर लग जायेगे वैसे भी परेशानियों या बदहाली का रोना रोने से कुछ ठीक होने वाला भिया नही ,जरुरत है उन जवाबो को ढूढने की और उस पर अम्ल करने की नही बल्कि एक क्रांति करने की जिसे आप या हम सभी जानते है
सोमवार, 28 सितंबर 2009
दरिया - दुर्दशा
''जल ही जीवन है '' अपने आप में एक पूर्ण सत्य है यह वाक्य , नदियों के किनारों से ही जन्म हुआ मानव सभ्यता का चाहे वो सिन्धु नदी सभ्यता हो या नील नदी से अवतरित मिस्र की सभ्यता अथवा दजला फरातके किनारे जन्मी मेसोपोटामिया की सभ्यता ये सभी नदियों के किनारे ही पल्लवित और पोषित हुई मानव सभ्यता उत्तरोत्तर आगे ही बढ़ती गयी और पुरे विश्व में छा गई भारतवर्ष जिसे नदियों का देश भी कहाजाता हैप्रकृति ने यहाँ नदियों का जाल सा बिछा रखा है सदियों से भारतवंशियों ने नदियों को माँ के समान दर्जा दिया उसकी पूजा की गंगा यमुना ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियों के साथ कितनी ही छोटी-छोटी नदिया देश भर में पानी की जरुरतो को पूरा करती हुई इस मानव सभ्यता जो अनवरत आगे बढ़ा रही है कितनी ही धार्मिक और एतिहासिक कथाये इन नदियों से जुड़ी है बालकृष्ण की नटखट लीला को तो केवल यमुना का किनारा ही बया कर सकता है और न जाने कितनी ही कथाये बिखरी पड़ी है इन खामोश नदियों केकिनारे ..........
''पतितपाविनी गंगा '' माना गया है की ये शिवजी की जटा से उत्त्पन्न हुई है जिन्हें भगीरथ ने अपनी कठिन तपस्या से इस धरती पर मानव कल्याण के उतारा था कथा चाहे जो भी रही हो लेकिन भारत की नदियों में एक श्रेष्ठ स्थान रखती है गंगा ऋषिकेश गंगा केमैदानी भाग का प्रवेश द्वार जहा से गंगा मैदानी भागो को हरा-भरा उपजाऊ करती चली आई है लगभग २५०० किमी लम्बी यह नदी अपने सफर में ७५ करोर टन मिटटी उठाती है गंगा का मैदान आबादी का सबसे घाना छेत्र माना जाता है गंगा के तट पर बसावट बहुत तेजी के साथ हुआ खासतौर से बनारस नगरी में लगभग १५ लाख से उपर कि आबादी का छेत्र है बनारस बनारस कि मस्ती बनारस का अल्हड़पन तो विख्यात है लेकिन इसके साथ जुड़ गया है एक स्याह पहलु भी जिस मोक्षदायिनी गंगा ने हमेसैकडो वर्षो से अपना प्यार अपना दुलार दिया बदले में हमने उसे क्या दिया गौर फरमाइए जरा इन आकडो पर जो केवल बनारस शहर के है सभी को मोक्ष प्रदान करने वाली पावन गंगा आज सीवेज के कारण८०%प्रदूषित हो चुकी है ८करोड़ लीटर मलबा सीधे घाटों के द्वारा नदी में पहुचता है १३०करोर लीटर सीवेज का कचरा प्रतिदिन हम इस मोक्षदायिनी को अर्पित करते है १५००० टन राख केवल श्यमसान घाटो के द्वारा इस नदी में जाता इसके साथ ही साथ श्रद्धालुओ का दबाव भी बहुत ज्यादा है रोजाना तक़रीबन ७००० लोग इस नदी में नहाते धोते है जबकि विशेष धार्मिक अवसरों पर इनकी संख्या तो लाखो में पहुच जाती है आज गंगा के पानी में बैक्टेरिया १०० एम्एल /६०००० प्वाएंत तक है सोचा जा सकता है क्या हाल कर दिया हमने अपनी मोक्षदायिनी का जो हमेशा से ही देती आई है एसा हाल केवल गंगा का ही नही अपितु लगभग सभी नदियों का हो चला है ६०% से अधिक डैम नदियों पर बनाये जा चुके है जिनकी संख्या लगभग ५०००० है सभ्यता के विकास का सीधा नाता रहाहै इन नदियों से और आज नही तो कल सभ्यता के विनाश का नाता होगा अगर हम न सुधरे ...........
''पतितपाविनी गंगा '' माना गया है की ये शिवजी की जटा से उत्त्पन्न हुई है जिन्हें भगीरथ ने अपनी कठिन तपस्या से इस धरती पर मानव कल्याण के उतारा था कथा चाहे जो भी रही हो लेकिन भारत की नदियों में एक श्रेष्ठ स्थान रखती है गंगा ऋषिकेश गंगा केमैदानी भाग का प्रवेश द्वार जहा से गंगा मैदानी भागो को हरा-भरा उपजाऊ करती चली आई है लगभग २५०० किमी लम्बी यह नदी अपने सफर में ७५ करोर टन मिटटी उठाती है गंगा का मैदान आबादी का सबसे घाना छेत्र माना जाता है गंगा के तट पर बसावट बहुत तेजी के साथ हुआ खासतौर से बनारस नगरी में लगभग १५ लाख से उपर कि आबादी का छेत्र है बनारस बनारस कि मस्ती बनारस का अल्हड़पन तो विख्यात है लेकिन इसके साथ जुड़ गया है एक स्याह पहलु भी जिस मोक्षदायिनी गंगा ने हमेसैकडो वर्षो से अपना प्यार अपना दुलार दिया बदले में हमने उसे क्या दिया गौर फरमाइए जरा इन आकडो पर जो केवल बनारस शहर के है सभी को मोक्ष प्रदान करने वाली पावन गंगा आज सीवेज के कारण८०%प्रदूषित हो चुकी है ८करोड़ लीटर मलबा सीधे घाटों के द्वारा नदी में पहुचता है १३०करोर लीटर सीवेज का कचरा प्रतिदिन हम इस मोक्षदायिनी को अर्पित करते है १५००० टन राख केवल श्यमसान घाटो के द्वारा इस नदी में जाता इसके साथ ही साथ श्रद्धालुओ का दबाव भी बहुत ज्यादा है रोजाना तक़रीबन ७००० लोग इस नदी में नहाते धोते है जबकि विशेष धार्मिक अवसरों पर इनकी संख्या तो लाखो में पहुच जाती है आज गंगा के पानी में बैक्टेरिया १०० एम्एल /६०००० प्वाएंत तक है सोचा जा सकता है क्या हाल कर दिया हमने अपनी मोक्षदायिनी का जो हमेशा से ही देती आई है एसा हाल केवल गंगा का ही नही अपितु लगभग सभी नदियों का हो चला है ६०% से अधिक डैम नदियों पर बनाये जा चुके है जिनकी संख्या लगभग ५०००० है सभ्यता के विकास का सीधा नाता रहाहै इन नदियों से और आज नही तो कल सभ्यता के विनाश का नाता होगा अगर हम न सुधरे ...........
शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009
परिकल्पना :तीसरे विश्व युद्ध की
तमाम बुद्धिजीवी वर्ग अक्सर कयास लगते रहते है की तीसरा विश्व युद्ध किन कारणों से होगा कोई पानी तो कोई परमाणु बताता है आज का परिदृश्य भी कुछ एसा ही है शक्ति मिलने पर मनुष्य की प्रवित्तिअहंकारी हो ही जाती है जिसे आज का बुद्धिजीवी वर्ग भी नही समझ पा रहा सदियों पहले भगवान कृष्ण ने इसे समझ लिया था तभी महाभारत युद्ध के बाद दुर्वासा ऋषि के शाप के द्वारा शक्तिशाली यादव वंस का सर्वनास कराया साथ ही अपने मुक्ति का द्वार भी खोल लिया आज भले ही दुनिया परमाणु के ढेर पर खड़ीहो लेकिन तीसरे विश्व युद्ध का कारण कुछ और ही होगा और वो कारण है सभ्यताओ का महायुद्ध धर्म के अनुयायियों का भीषड़ संग्राम जो पुरी दुनिया को अपने चपेट में ले लेगा आज से कुछ सौ साल पहले जब इस्लाम धर्म का उदय हुआ उस समय भी कई धर्म और सभ्य्ताये मौजूद थीं लेकिन धीरे धीरे जब इस्लाम ने अपने कदम मक्का से आगे बढाये तो कितने ही धर्मो और सभ्यताओ का उनमे विलय हो गया वजह चाहे जो भी रही हो चाहे वो "इस्लाम का शक्तिशाली आधार रहा हो या मुसलमानों का ऊँचा मनोबल "लेकिन सत्य यही है की जितनी तेजी से इस्लाम ने पुरे विश्व में अपना झंडा बुलंद किया उतनी तेजी से किसी और ने नही यही वजह है आज आधी दुनिया इस्लाम की अनुयायी है और धर्मो के बीच टकराव तो सदियों से होता चला आ रहा प्राचीन मिश्र को ही ले लीजिये जहा पर १८वे साम्राज्य के पहले प्रमुख देवता सूर्य थे जिन्हें आमोन कहा जाता था बाद में एमोन रे नम के देवता ने इनका स्थान ले लिया १९वे वंस में प्रतापी रजा एमोन्हेतोप चतुर्थ जिसने अपना नम बदलकर एखनातोंन कर लिया था उसने ओतोन देवता की सत्ता घोषित कर दी और उसने हुक्म दिया की ओतोन के सिवा सारे देवताओ का नाम मिटा दिया जाय इसी तरह देवताओ के आड़ में मनुष्यों ने परस्पर अपने धर्म और देवताओ को लेकर जंग लड़ी और जब हम ईसामसीह के बाद का अवलोकन करते है तो पाते है की इसाइयत ने भी अपना प्रचार प्रसार बड़ी तीव्र गति से किया फलस्वरूप आज इस्लाम के बाद केवल इसाइ ही है जो लगातार अपनी वृध्ही दर्ज करना चाहते है
और ये भविष्य वाणी करना ज्यादा मुश्किल नही होगा की वह दिन दूर नही जब दो महाशक्तियों का एक महासंग्राम होगा जिसमे हजारो लाखो लोग मरे जायेगे लेकिन इसके साथही उठेगा प्रकिती का कहर जो पुरी दुनिया को तबाह कर देने के लिए काफी होगा
और फ़िर से होगा एक नई मानव सभ्यता का जन्म ;
और ये भविष्य वाणी करना ज्यादा मुश्किल नही होगा की वह दिन दूर नही जब दो महाशक्तियों का एक महासंग्राम होगा जिसमे हजारो लाखो लोग मरे जायेगे लेकिन इसके साथही उठेगा प्रकिती का कहर जो पुरी दुनिया को तबाह कर देने के लिए काफी होगा
और फ़िर से होगा एक नई मानव सभ्यता का जन्म ;
रविवार, 19 अप्रैल 2009
अर्थ-अनर्थ
"जेहाद" जिसका अर्थ है धर्म -उध्ह लेकिन आज जेहाद के मायने बदल गये है जेहाद का मतलब अब महज खून की नदिया बहाना हो गया है जो हाथ पहले काफिरों का खून बहाते थे आज वही अपने भाइयो का भी खून बहाने से नही हिचकते वह भी जेहाद की आण में आज का आम मुसलमान यह तय नही कर पा रहा कि जेहाद का मतलब क्या होता है क्या ये सही है या गलत ?
इसी तरह कुछ और शब्द है जिनके मायने बदल गये है जैसे "कट्टर " कोई हिंदू अगर आर एस एस का सदस्य हो जाता है तो उसे कट्टर हिंदू के नाम से नवाज़ दिया जाता है ठीक उसी तरह कोई मुसलमान पाचों वक्त नमाज़ अता करे ,खुदा कि इबादत करे तो उसे कट्टर मुसलमान कह दिया जाता है
यहा कट्टरता का अर्थ पूरी तरह से उल्टा करके रख दिया गया है ,कट्टरता का अर्थ है अपने धर्म ,मजहब को पूरी तरह से मानना और उस पर अम्ल करना किस धर्म में लिखा है कि दुसरे धर्मो की बुराई करो उन्हें नीचा दिखाओ और आज जो लोग ऐसा करते है उन्हें ही कट्टर कहा जाता है चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान
इसी कड़ी में आता है एक शब्द "नेता " जिसका अर्थ है है जननायक जो जनता की आवाज़ बुलंद करता हो जो आम जन के बीच से निकला हो जिसने आम जनता की दुस्वारिया झेली हो जैसे हमारे नेताजी सुभास चन्द्र बोस और अब पन्ना उलटते है तो पाते है कुछ नाम जिन्हें सारा देश जनता है उनका जनता से कितना जुडाव है सबको पता है फ़िर भी चुनना है क्योकि लोकतंत्र है तो जो सबसे कम बुरा हों उसी को चुन लो ; सबके मन में चोर है सब सत्ता के लोभी है और क्यों न हो राजनीती आज व्यापार बन चुकी है एक करोड़ लगाये है पाच साल में दस करोड़ कमाना है बस यही मकसद है जनता जाए भांड में राजनीती अब राजनीती न रहकर व्यापार नित बन चुकी है इस शब्द के मायने भी बदल चुके है रही बात नेताजी की तो इसका अर्थ कभी आम जनता से पूछिये वो आपको इनकी विशेषता के पहाड बता देगा
और कुछ तो यहाँ तक कहते नजर आते है की
( नेता वाही जो ताने रहे ,सुरा सुन्दरी भंग छाने रहे)
इसी तरह कुछ और शब्द है जिनके मायने बदल गये है जैसे "कट्टर " कोई हिंदू अगर आर एस एस का सदस्य हो जाता है तो उसे कट्टर हिंदू के नाम से नवाज़ दिया जाता है ठीक उसी तरह कोई मुसलमान पाचों वक्त नमाज़ अता करे ,खुदा कि इबादत करे तो उसे कट्टर मुसलमान कह दिया जाता है
यहा कट्टरता का अर्थ पूरी तरह से उल्टा करके रख दिया गया है ,कट्टरता का अर्थ है अपने धर्म ,मजहब को पूरी तरह से मानना और उस पर अम्ल करना किस धर्म में लिखा है कि दुसरे धर्मो की बुराई करो उन्हें नीचा दिखाओ और आज जो लोग ऐसा करते है उन्हें ही कट्टर कहा जाता है चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान
इसी कड़ी में आता है एक शब्द "नेता " जिसका अर्थ है है जननायक जो जनता की आवाज़ बुलंद करता हो जो आम जन के बीच से निकला हो जिसने आम जनता की दुस्वारिया झेली हो जैसे हमारे नेताजी सुभास चन्द्र बोस और अब पन्ना उलटते है तो पाते है कुछ नाम जिन्हें सारा देश जनता है उनका जनता से कितना जुडाव है सबको पता है फ़िर भी चुनना है क्योकि लोकतंत्र है तो जो सबसे कम बुरा हों उसी को चुन लो ; सबके मन में चोर है सब सत्ता के लोभी है और क्यों न हो राजनीती आज व्यापार बन चुकी है एक करोड़ लगाये है पाच साल में दस करोड़ कमाना है बस यही मकसद है जनता जाए भांड में राजनीती अब राजनीती न रहकर व्यापार नित बन चुकी है इस शब्द के मायने भी बदल चुके है रही बात नेताजी की तो इसका अर्थ कभी आम जनता से पूछिये वो आपको इनकी विशेषता के पहाड बता देगा
और कुछ तो यहाँ तक कहते नजर आते है की
( नेता वाही जो ताने रहे ,सुरा सुन्दरी भंग छाने रहे)
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